किसान को कृष्ण मानने से क्या होगा?

               'कृष्ण' का शाब्दिक अर्थ और 

      कृष्ण के कर्म-जीवन का निहितार्थ

                                प्रस्तुति: डॉ मलखानसिंह, पूर्व प्राचार्य



          'कृष्ण' शब्द संस्कृत की कृष् धातु से बना है. कृष् धातु के माने हल खीचना. अर्थात हल चलाने वाली कृषि संस्कृति में कृष्ण का जन्म होता है. इसीलिए उनके बड़े भाई हलधर भी कहे जाते हैं. हलधर व कृष्ण दोनों कृषि, कृषक व कृषि-संस्कृति से संबंधित हैं. गौ पालन व गौ से उत्पन्न बछड़े खेती-किसानी में सहायक होते थे।

        कर्षण, आकर्षण, विकर्षण, अपकर्षण सभी कृष् धातु से व्युत्पन्न हैं।

     वास्तव में कृष्ण कृषि संस्कृति के वाहक हैं। खेतिहर कबीलाई समुदाय ही सामाजिक आर्थिक संरचना में गणराष्ट्र की राजनीतिक प्रणाली के वाहक थे. उस समय राज्य, राजा का उदय नहीं था. एक मात्र राजनीतिक प्रणाली गणराष्ट्र कही जाती थी जो सामूहिक स्वामित्व की आदिम राजनीतिक प्रणाली थी.

        इस गणराष्ट्र की राजनीतिक प्रणाली की कब्र पर सामूहिक स्वामित्व के विसर्जन व उसकी जगह ब्यक्तिगत स्वामित्व के विकास स्वरूप राज्य सत्ता का उदय जनपद राज्यों के रूप में हुआ। यह संक्रमण वैदिक जनों से आरम्भ होकर भारतीय इतिहास में मौर्य काल के उपरांत साम्राज्य व छोटे छोटे सामंत शासकों तक चलता रहा।

         ईरान से आए इंद्र ने राज्य उदय व विस्तार की दस्तक दी जो अश्वमेघ, गौमेध व नरमेध यज्ञों की तांडव विभीषिका में हुआ। यज्ञों में पशु बलि प्रथा भी बाहरी ही है। कृष्ण ने इंद्र के इस राज्य व साम्राज्य अभियान का पुरजोर विरोध भी किया। इंद्र अर्थात पुरंंदर या पुर नगरों का दलन करता हुआ साम्राज्य का विस्तारक होने से ऋग्वेद के अनुसार कृष्ण का शत्रु कहा गया।

        गौतम बुद्ध शाक्य गणराष्ट्र का युवा होते ही गणराष्ट्र प्रणाली के पक्ष में राज्य के खिलाफ विद्रोही बने।

      कृष्ण, बुद्ध राज्य प्रणाली से बगावत कर गणराष्ट्र या रिपब्लिक प्रणाली के पोषक रहे हैं. हमारे लोकतंत्र का आधार भारत की प्राचीन गणराष्ट्र प्रणाली है। गणराष्ट्र में जातिभेद व वर्ग भेद का अभाव था।

       जातिवहीन, वर्गविहीन राष्ट्र की गणराष्ट्र प्रणाली के लिए कृष्ण, बुद्ध प्रासंगिक ही नहीं प्रतीक बन गये हैं। ये लोकनायक रहे इसी कारण भारतीय लोक ने इंद्र का वर्चस्व कभी स्वीकार नही किया।

      ऋग्वेद में इंद्र के संबंध में सर्वाधिक सूक्त-मंत्र होने के बाद भी इंद्र लोकनायक नही बन पाए। बाद में ब्रह्म या सर्वव्यापी चेतन सत्ता की जगह ब्राह्मण ग्रंथों से पुराण कालीन ब्रह्मा की अवधारणा लाई गयी लेकिन ब्रह्मा, विष्णु व महेश में ब्रह्मा लोकपूज्य नहीं रहा।

         पुष्कर को छोड़कर समूचे भारत में ब्रह्मा का एक भी मंदिर नही है. जबकि पौराणिक पूजा काल में भागवत धर्म के वासुदेव कृष्ण की- जो विष्णु के अवतार माने गये, भारत भर में उनकी कृष्ण के रूप में पूजा होती रही।

      विष्णु के कथित अवतार राम भी समूचे भारत में नहीं लोक पूज्य बन सके. शिव जो नागों के प्रतीक होने से पूजे गये वह भी कृषि संस्कृति के वाहक रहे और बैल उनका वाहन।

                                   ★★★★★★★

   

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